कवयित्री का नाम- नीता झा
शिर्षक- वो रस धाराएं कहाँ खो गईं
स्थान - छत्तीसगढ़, रायपुर
सघन वन से तीर चलते
नन्हा बच्चा भी न डरता
खेलता उन्मुक्त मन से
खिलखिला कर दौड़ता था
माँ भी कहाँ उसे रोकती
कभी भी घूमने से न टोकती
उन्मुक्त मगन बचपन आल्हादित
चहुं ओर अपनत्व की घेरा बंदी
तेरा मेरा का न राग कंठ पर
सारा जहां अपना बसेरा था
कलकल बहते झरने संग
मीठी तान कब छिड़ जाती
पानी भरने आई ताई कब
सुर सुधार जाया करती
पता नहीं चलता दादी
किसे ज्यादा चाहती थी
सारी स्त्री साथ बैठकर
रसोई मिलबांट पकाती
बड़े बरगद से घर होते थे
सुंदर चाहे कम पर कच्चे
ठंडे ठंडे सीधे साधेघर होते थे
चार छः बुजुर्ग,आठ-दस अधेड़
और ढेरों बच्चे होते थे
कहाँ गया वह निष्छल घर
और कहां गईं वो माताएं
मिल जुल जो सींचा करतीं
वो रस धाराएं कहाँ खो गईं
नीता झा
मौलिक
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