Monday, September 30, 2019

छत्तीसगढ़ से कवयित्री शशिकला कठोलिया की रचना- वर्षा ऋतु

नाम:- श्रीमती शशिकला कठोलिया
शीर्षक:- वर्षा ऋतु
राज्य:- छत्तीसगढ़
संपर्क न.:-

ग्रीष्म ऋतु की प्रचंड तपिश,                                        प्यासी धरती पर वर्षा की फुहार,                                    चारों ओर फैली सोंधी मिट्टी,                              
प्रकृति में होने लगा जीवन संचार।

दिख रहा नीला आसमान ,
सघन घटाओं से आच्छादित ,
वर्षा से धरती की हो रही ,
श्यामल सौंदर्य द्विगुणित ।

छाई हुई है खेतों में ,
सर्वत्र हरियाली ही हरियाली ,
नाच रहे हैं वनों में मोर ,
आनंदित पूरा जंगल झाड़ी ।

नदिया नाला जलाशय,
जल से दिख रहे परिपूर्ण ,
इंद्रधनुष की सतरंगी छटा,                                  
अलंकृत किए आसमान संपूर्ण ।

हो गई थी सारी धरती ,
ग्रीष्म ऋतु में बेजान वीरान ,
वर्षा ऋतु के आगमन से ,
कृषि कार्यों में संलग्न किसान।

कृषि प्रधान इस भारत में ,
वर्षा प्रकृति की जीवनदायिनी ,
सच कहा है किसी ने ,
वर्षा अन्न वृक्ष जल प्रदायिनी।

श्रीमती शशिकला कठोलिया, शिक्षिका, अमलीडीह ,डोंगरगांव

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