Monday, September 23, 2019

महाराष्ट्र से कवि संजय वासनिक की कविता- निब्बाण

कवि:- संजय वासनिक
शीर्षक:-निब्बाण
पता:- चेंबुर , मुंबई, महाराष्ट्र
भ्रमणध्वणी :- ९८६९०८१४८४.
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*निब्बाण*

ज़िंदगी बहुत छोटी है
एक दिन जब
तुम मर जाओगे
तब तुम सौ साल के
भी ना होंगे ....
अगर तुम बुढ़ापा
महसूस भी नहीं करोगे
तब भी उम्र तुम्हें बता देगी
की तुम अब थक चुके हो....

तुम्हारा ख़ुशहाल
और ये रंगीन जिवन
एक दिन फीका पड़ जायेगा
तब तुम सदमे में जाओगे ...

क्योंकि इस धरातलपर
कुछ भी स्थायी नहीं
सब कुछ अनित्य
तुम्हें ये भी पता होगा
तुम्हारी अपनी चीज़ें
और ख़ुद तुम्हारा
जिवन भी यथार्थ नहीं ...

शायद तुम्हारे अपने
सुखदायी और आरामदेह
घरौंदे में भी कभी
चैनसे नही महसूस कर पाओगे
ना ही आराम से रह पाओगे ... 

ईसिलीये तुम कभी किसी
भौतिक वस्तुसे ईतना
क़रीब ना जाना और
ना ही उससे लगाव रखना
की तुम्हे उससे प्यार हो जाये ..
तुम सोचते हो हर चीज़
जो तुम्हारे पास है
वह तुम्हारी है ....

पर ज़रा यहाँ रुको
एक पल के लिये सोचो
जब तुम मर जाओगे
तब क्या रहेगा
तुम्हारा तुम्हारे पास....
क्या साथ आयेगा ...
थोड़ा सोचो और समझो
ख़ुद से प्यार करो
वर्तमान में जियों
जो सत्य है ...

सब भुल जाओ
आराम चैन और नींद
खोकर जमा की गयी
भौतिक वस्तुओं को...

क्योंकि तुम्हारे सपने भी
तुम्हारे अपने नहीं होते ...
सपनों में  जब तुम
किसीसे मिलते हो और
फीर जागते  हो तब
सब का सब कही
विलीन हो जाता है....

तुम जिससे बेहद 
प्यार करते हो
तुम्हारा अपना
बहुत क़रीबी व्यक्ति
अगर  मर जाता है तब
तुम फिरसे अकेले पड़
जाते हो.....

बस ईसी तरह है
तुम्हारा जीना है खुद से
केवल वर्तमान में
खुद के लिये, खुद से
और यही है
जिवन का अंतिम सत्य ....
यही है निब्बाण  ....
( भगवान बुध्द के सुत्त निपान पर आधारित )
# संजय वासनिक “ वासु”

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