कवयित्री का नाम- नीता झा
शिर्षक- माँ - बेटी
स्थान- रायपुर, छत्तीसगढ़
माँ बेटी निकलीं घर से
लेना था सौदा दो चार
पहुंच गईं सीधे से वे
जहां दिखे व्यापारी सरकार
चिकनी चुपड़ी बातों के
खूब हुए प्रयोग वहां
कुछ अनमने कुछ उत्साहित
सौदे ले जब पहुंचे घर
माथा सारा घूम गया था
दोनों माँ बेटी का
सौदा कुछ खास नहीं पर
पैसा सारा रीता था
बदन के जेवर
चुनर के गोटे
न जाने कहाँ
खो गए थे
बोल नहीं कुछ पा रही थीं
बस रोये वो जा रही थीं
भाषा,संस्कृति और
सद्भावना की वो
अर्थी खूब सजा रही थीं
आधुनिकता की अंधी दौड़ की
वे ही तो विजयी प्रतिभागी थीं
नीता झा
मौलिक स्वरचित रचना
समसायिक रचना सम्वेदना से भरपूर।
ReplyDelete👍👍👌👌
बहुत ही अच्छी कविता
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