Tuesday, September 10, 2019

छत्तीसगढ़ से कवि उमेश मंडावी की व्यंग रचना

कवि -उमेश मंडावी
शीर्षक - बेशरम का पौधा
संपर्क- पोस्ट आफीस कोंडागाव , जिला-  कोंडागाव
राज्य -- छत्तीसगढ

बेशरम का पौधा (व्यंग्य)
एक नेताजी अपने बगीचे मे, बेशरम के पौधे लगा रहे थे|
पौधो को देख ,---
बेशर्मो की तरह मुस्कुरा रहे थे |
मैने पूछा --
नेताजी ,आप बगीचे मे
बेशरम के पौधे क्यो लगा रहे है ?
अरे !  गुलाब ,मोगरा, गेंदा,  चंपा, चमेली  ,रात रानी के पौधे लगईऐ
बगीचे के साथ - साथ  ,
पूरे मुहल्ले को महकाईऐ |
नेताजी बोले -  
आप नही समझेगे ,
हम नेताओ और बेशरम के पौधो का अटूट रिश्ता है |
जिसप्रकार -
आप मनुष्य बंदर को,
अपना पूर्वज मानते है
उसीप्रकार -
हम नेता ,इन बेशरम के पौधो को, अपना पूर्वज मानते है |
गुण भी इनके जैसा ही पाते है ,
हमे चाहे गाली दो या ताली दो |
हम बेशरम के फूल की तरह ,
सदा मुस्कुराते रहते है |
हमारी उत्पत्ति भी ,
इन बेशरम के पौधो की,
तरह ही हुई है |
देखो  ना - छोटे छोटे राज्य बने, छोटे छोटे जिले बने |
जनता का कोई भला नही हुआ,
हा -  नेताओ की संख्या बढ गई |
आज हर  मुहल्ले मे ,हर गली मे, चारो ओर  , नेता ही नेता
नजर आते है  |
ठीक बेशरम के पौधो की तरह --
एक उगाओ हजार उग आते है |
एक उगाओ हजार उग आते है |
एक उगाओ हजार उग आते है|

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