3. कवि:- संजय वासनिक
शीर्षक:-मेरी राष्ट्र भाषा...
पता:- चेंबुर , मुंबई, महाराष्ट्र
भ्रमणध्वणी :- ९८६९०८१४८४.
मेरी राष्ट्र भाषा...
(अतंरराष्ट्रीय हिंदी दिवस पर एक छोटीसी कोशीश...)
दो दिन की चांदनी
फिर अंधेरी रात....
क्यों करते हैं भाई,
हम राष्ट्र भाषा की बात ....
भुल जाओ इसे,
होगा यही बेहतर...
नही तो कैसे जा पायेंगे
हम आंतरराष्ट्रीय स्तर पर...
बच्चो को फिर भारत में ही
पढाना होगा...
अमरिका जाने के सपनो से
तुम्हे हाथ धोना होगा...
आजकल तो हम हिंदी भी
अंग्रेजी में लिख लेते है...
जब काम चल जाता है
तो क्यों हम हिंदी सिखते है...
क्यों नही चाहते हो
हमारी भाषा की उन्नती ...
बताओ कहाँ थम गई चीन,
जापान, जर्मनी और रुस की प्रगती…
क्यों हमें हमारी भाषा की
कोई फिक्र नहीं,
गुलामी की मानसिकता है बस,
स्वसम्मान का जिक्र नहीं......
कब होगी हमारी हमारे
अंतरआत्मा से मुलाकात,
कोसो दूर है खुद से,
राष्ट्रभाषा की छोड़ो बात....
भूला चुके है पाली और
संस्कृत को कबसे ,
हिंदी को भी भूल जाएंगे
हम आहिस्ते आहिस्ते.....
ए हिंदुस्थानी पूत तुम सिर्फ क्या
विदेशियों की नकल कर पाओगे,
श्रेष्ठ वाङ्ग्मय रचयिता ए कुल वंश तुम,बंदर बनकर रह जाओगे.......
एक अदनासा है सुझाव
करे हम अपने आप से ही
अपनी भाषा मे ही संवाद,
फिर क्यों करना है ...
हिन्दी की श्रेष्ठता पर विवाद ....
# संजय वासनिक ”वासु”
Very nice sir
ReplyDeleteBahut sundar kavita hai Sanjay ji
ReplyDeleteVery good dear Sanjay
ReplyDeleteअतिशय सुंदर
ReplyDeleteVery well written and very beautiful
ReplyDeleteLike
ReplyDeleteVery nice compose sir
ReplyDeleteIts a very nice sir..
ReplyDeleteVery Nice
ReplyDeleteVery nice sir 💐💐
ReplyDeleteVery nice 👌
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