Tuesday, September 17, 2019

छत्तीसगढ़ से कवि दिनेश कुमार विश्वकर्मा की प्रकाशित रचना- मौन

कवि: दिनेश कुमार विश्वकर्मा
शीर्षक: मौन
राज्य: छत्तीसगढ़
सम्पर्क: 8463852536
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                       मौन

चिंतन चुप
मनन मौन
धधकती धरती
गगन मौन....
प्यारी हिंदी
प्यासी हिंदी
उस पर
साहित्य का
सावन मौन....

कबीर के दोहे
तुलसी की चौपाई
दुष्यंत की ग़ज़ल
हिंदी में समाई
युगों से तुमको
मीरा है पुकारती
कब तक रहोगे
मोहन मौन....

देखी जो हिंदी
माथे पे बिंदी
बाबुल से चुपके
बोली ये हिंदी
बहुएँ जलती
दहेज दहलती
काजल पायल
कंगन मौन.....

तड़पती हिंदी
सिसकती हिंदी
पिछड़ती हिंदी
बिछड़ती हिंदी
ग़बन गोदान
कफ़न मौन....

हिंदी ने सुनाई
प्यारी इक कहानी
वेदों की संस्कृत
बुद्ध की पाली
महावीर की प्राकृत
थोड़ा सा अपभ्रंश
भाषा हुई सुहानी...
अ, आ, इ, ई रहते थे
एक छोटे से गाँव मे
अलिफ, बे, पे, ते बाशिंदे थे
इसी निराले गाँव में
क, ख, ग, घ प्यारे से
टे, से, जीम, चीम रहते भाईचारे से
एक दिवस को ए, बी, सी, डी
आई करती मनमानी
जे, के, एल, एम घुस आये थे
क्ष, त्र, ज्ञ के देश में
शिकन पड़ी थी माथे पर
जेर, जबर और पेश में
हिन्दी ने सबको समझाया
हिंदी ने सबको अपनाया
जब कभी कोई 'बोली'
अपना मनोबल तोड़ लेती है
प्रांतों की दीवार को
हिंदी जोड़ देती है
बात बस इतनी है
कलम जो कुछ लिख जाता है
साहित्य अमर हो जाता है
रह जाता है
जीवन मौन..
धधकती धरती
गगन मौन...
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दिनेश कुमार विश्वकर्मा
कोंडागाँव(छत्तीसगढ़)

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