Tuesday, September 3, 2019

छत्तीसगढ़ से कवि गौरीशंकर कश्यप की व्यंग्यात्मक रचना

*मैं बाजार से सब्जी लेकर*
*घर आ रहा था*
*अचानक एक मंदी बाज*
*फेसबुकिया नेता  सुलभ से*
*निकलता हुआ दिखा*

*मुझसे उसकी तकलीफ*
*देखी नही जा रही थी*
*मैंने उनसे सामने जाके पूछा*    
            _जनाब_
*वही हो ना जो फेसबुक पे*
*वाट्सअप पर ,*
*मंदि का रोना रोते हो,*

*भाई साहब आप ये बताइए*
*मंदी के दौर में क्या यहीं रहते,*
*यही खाते ,यहीं सोते हो* *?*

*वो गुस्से से लाल हो गया,*
*मेरे तरफ गुर्राया,*
*अपना काला चश्मा निकाला,*

*कहा भाई ठीक पहचाना*
*मगर एक बात सुनो*
        _मै कहता हूँ_
*मैं यहां नही ,पास के कोलिनी में*
*प्रधान मंत्री आवास में रहता हूँ*

*फिर मेरा दिमाग चकराया*
*सरीर तकपकया*
*मन ही मन बात ये सोचने लगा*
*फिर हिम्मत लाई बात पूछने लगा*

*भाई साहब फेसबुक में तो*
*बड़ी बड़ी भाषण दे रहे थे*
*मंदी बड़ा देश में कहकर*
*खूब रो रहे थे*

*मुझे लगा आप लाचार होंगे*
*मंदी के पीड़ा से तार तार होंगे*
*खाने को कुछ नही होगा ,*
*आप गरीबी झेलते होंगे*
*तब जा के फेसबुक में*
*मंदी का ज्ञान पेलते होंगे*

*वो फिर घबराया*
*थोड़ा हकलाया*

*भाई मंदी ने तो सब की*
*जान ले रखी है*
*होटल में कुछ नही खाया*
*बस 2 समोसा 2 डोसा*
*2 गुलाबजामुंन चक्खी है*

*मैंने फिर पूछा भाई ठीक है*
*आप ने 2 समोसा 2डोसा*
*2गुलाबजामुन चक्खी है*
*आप ने एक मर्सडीज वैन*
*भी रखी है*

*बात वो नही की मंदी के दौर में*
*आप ने क्या खाया है*
*ये बताइए इतनी मंदी में*
*खुले में छोड़ सुलभ क्यों आया है*

*वो बेचारा गरम हो गया*
*गुस्सा का सीमा चरम हो गया*

*गाल लाल हो गया*
*लगा की नेता हलाल हो गया*

*नेता जी गुस्से से थरथराने लगे*
*हाथ भी उसके कपकपाने लगे*

*सुन तुझको मंदी का*
*एक सच बताता हूँ*
*घर मे दाल चावल नही है*
*इस लिए सुलभ का खाता हूँ*

🤣🤣🤣


                 🖋🖋🖋
*कवि गौरीशंकर कश्यप* _सिरफिरा_

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