कवि : दिनेश कुमार विश्वकर्मा
शीर्षक: नारी
राज्य: छत्तीसगढ़
सम्पर्क: 8463852536
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नारी
बेटी का ब्याह
ग़रीब पिता के लिए
होता है जीवन भर का स्वप्न
देखा...कई बार इसके लिए
खेत बिकते, खलिहान बिकते
देखा...कई बार
ख़ुद के अरमान बिकते
क्योंकि ...पुत्री के रूप में
जन्म लेती है लक्ष्मी
कुंती का रहस्य, द्रोपदी का प्रतिशोध
सीता की पवित्रता, सती का हठ
शबरी की प्रतीक्षा, मीरा का समर्पण
जिनकी साधना में देखा...
कई बार भगवान बिकते...
देखा... कई बार
ख़ुद के अरमान बिकते
बेटियाँ जैसे साँस की डोर
जीवन के तम में, आशा की भोर
रसोई की रौनक, हँसता आँगन
कुटुम्ब की अस्मिता
इसलिए तो बिदाई में
अनंत अश्रुओं के बूँद से भी ऋण
चुकाया नहीं जाता...
जाने क्यूँ, इस युग में सहज है
पर देखा नहीं जाता
'आधुनिकता'के नाम पर
'नारी' का सम्मान बिकते
देखा... कई बार
खेत बिकते, खलिहान बिकते
कई बार खुद के अरमान बिकते...
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दिनेश कुमार विश्वकर्मा
कोण्डागाँव (छत्तीसगढ़)
Well-favoured
ReplyDeleteबहुत ही सुन्दर
ReplyDeleteTHE GROUND REALITY HAS BEEN HIGHLIGHTED.. A TRUE REFlECTION OF INDIAN NOBLE WOMEN their story, sacrifice and power
ReplyDeleteAnd finally the heart touching Indian culture of marriage ..
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