*कवि-धनंजय सिते(राही)*
*जिला-छिन्दवाड़ा(म.प्र.)*
*सम्पर्क-9893415829*
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*सूरत/चेहरा/मुखड़ा*
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मन की सुंदरता को देखो
ना सूरत देखो ना ही तन!
तन जितना खूबसूरत हो
जरुरी नही उतना हो मन
२
कितनो ने धोखा खाया है
खूबसूरत इन मुखड़ो पर!
अब बहा रहे है वह आँसू
उनसे पाए दुखड़ो पर!!
३
कभी उल्टा भी हो जाता है
सूरत बुरी देख नाता तोड़े!
वही काम का होता शख्स है
फिर जाते हांथ को जोड़े!!
४
उपर से जो दिखता काला
कभी मन उजला होता है!
जो तन से जितना गोरा हो
उतना मन मैला होता है!!
५
श्वेत श्याम देख के मुखड़ा
ना अच्छा बुरा तोलो तुम!
विपरित भी हो सकते परस्पर
मन और सूरत ना भूलो तुम!!
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*स्वरचित,मौलिक,रचना*
*कवि-धनंजय सिते(राही)*
Friday, August 30, 2019
छिन्दवाड़ा(म.प्र.) से कवि धनंजय सिते(राही) की रचना सूरत
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