दिनाँक-२८/०४/२०१९
दिन-रविवार
विषय-माँ
विधा-कविता
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माँ का दर्द
जितना दिया है माँ बाप का दिया है,
वरना तुम्हारी कोई औकात नही,
चुका न पाओगे उनके प्रेम का ऋण कभी,
क्योंकि तुममें भरा वो जज्बात नही।
कर लो मुँह बन्द किसी के दबाव में आकर,
उम्र भर पालेंगे वो लोग तुम्हें,
उसमें दिखती ऐसी कोई बात नही।
तेरे घर लौटने से पहले कभी सोई हो माँ कभी,
आई थी कभी ऐसी रात नही।
भूल गया तू क्या खोई है उसने तेरी खुशी की खातिर,
जब से हुआ तेरा ब्याह,
आई खुशी की उनके जीवन मे कोई बरसात नही।
जब झुठे इल्जाम लगा रही वो माँ पर,
सर झुकाए तू खड़ा था चुप,
तोड़कर रख दी तेरे बदलाव ने इसकदर उन्हें,
हो गई पहले की तरह वो गुमसुम,
कहते है बेटा आने वाले
कुल का मान बढ़ाएगा,
पर ये नही पता था एक दिन औलाद,
अपनी माँ को सबकी नजरों में गिरायेगा।
9 माह जिसने कोख में रखा,
तुझे जन्म देते वक्त जिसने असहनीय दर्द सही,
जो समझे न माँ की उस पीड़ा को
वो कभी किसी का हो सकता हमदर्द नही
जिस रोज माँ बिस्तर में पड़ी थी,
शरीर बुखार से तप रहा था,
सेवा करने के बजाय गपशप में
बेटे बहु का समय खप रहा था
अगर कभी उसका भाई होता सगा,
तो माँ के खिलाफ करने का दुख पता होता,
अपनी माँ सी समझती उन्हें भी,
उसे जलील करने का कोई खता न होता
बेटी तो वो है जो हर माँ बाप के त्याग को पहचाने,
पति के माँ बाप को भी अपना सगा माने।
जो खुद पल रहे माँ बाप के पैसों पर,
वो औरो से सास को बहु जैसे
रहने का पाठ पढ़वाती है,
घर का सारा काम छोड़कर खुद
अपने शौक से खेत को जाती है,
कहती अपने पिता से उसकी सास
जबर्दस्ती खेत उन्हें भिजवाती है।
कभी न की सासु की सेवा,
मायके में सेवा करने का झूठा अलख जगाती है,
आ जाए ननद घर पर कभी,
एक आंख उन्हें न भाती है।
लानत है ऐसी बहु पर जो सास ससुर के पैसों पर जी रही,
आभार उनका मानना छोड़कर,
आग में डाल घी रही।
राज कर रही रानी बनकर झूठ का पर्दा ओढ़कर,
नही कहा था किसी ने जाने
गई थी खुद घर छोड़कर,
जितना कर ले घर मे राज,
अब दिन दूर नही,
घमंड तोड़ेगा जल्द खुदा,
होगी चकनाचूर वही।
लाख आजमा ले कोई पैतरा,
सत्य की होती नही कभी हार,
करता है खुदा भले देर से फैसला,
पर असत्य की ही पराजय होती है हर बार।
....✍अनिता सुभाष देशमुख©
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