Sunday, July 7, 2019

दगा म डारे करिया रे by श्रवण कुमार साहू"प्रखर"


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दगा म डारे करिया रे,
काबर हमला, दगा म डारे।
तोर अगोरा म रे करिया,
आँखी सबके तरसत हे।
का होगे रे ,ये करिया ल,
काबर वो नई बरसत हे।।

रुख राई अउ चिरई -चिरगुन,
तोला पूछे रे करिया,
नदिया -नरवा ,डबरा- डबरी,
तोला पूछे रे तरिया।।
दगा म डारे--

तोला देखत दिन पहागे,
बीतगे महीना आषाढ़ के।
अब तक दरशन होवे नई हे,
नरवा -नदियाँ म बाढ़ के।।
दगा म डारे----

सुन रे करिया,जब ते रोबे,
तभे तो दुनियाँ ह हाँसही।
तोर आँसू जब धरती म गिरही,
तभे तो दुनियाँ  ह बाँचहि।।
दगा म डारे -----

तोर भरोसा म दुनियाँ हे,
हावय तोर बर बिस्वास रे।
अब तो बरस जा ,रे मोर करिया,
सबके बुझा दे  प्यास रे।।
दगा म डारे ---

सुने हावंव तोर अछरा म,
कतको भरे हावय पानी।
तभे तो सब दुनियाँ कहिथे,
करिया तोला औघड़ दानी।।
दगा म डारे---

गरज चमक के ,अब तो  करिया,
बरसा जा तेहा पानी।
नाचे, झूमें ये धरती ह,
खुश होवे सब ,जिनगानी।।
दगा म डारे-----
✒रचना
श्रवण कुमार साहू"प्रखर"
राजिम, गरियाबंद,(छ .ग.)

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