आषाढ़ के महीना म,
करिया से मिलगे कारी।
जीवरा तरसत हावय,
अब बरसात के हावय बारी।।
न कुछ देखे हे ,न कुछ सुने हे,
तभो ले एक दूसर के,
मया के बन गे, अधिकारी।।
जल्दी मिलहुँ ,कहे रहिस,
दिखत रहिस ,निच्च्ट बिचारी।
वोकर बात म करिया ह आगे,
सोचे सिरतोन, कहिस या लबारी।
चंदा बरोबर वोकर चेहरा,
चकचक ले चमकत हे।
सोच म पड़गे करिया ह,
वोहा काबर कहिस ,मैं कारी।।
कारी ल खोजे बर करिया ह,
घुमत, हे बखरी बारी ।
कोन जनी कोन रूप धर के,
छम से आही मोर कारी।।
मोर अमावस ल दूर करके,
भगाही मन के अंधियारी।।
वाह रे मोर कारी,वाह रे मोर कारी
रचना✒
श्रवण कुमार साहू"प्रखर"
राजिम, गरियाबंद(छ .ग.)
Sunday, July 7, 2019
कारी by श्रवण कुमार साहू"प्रखर"
Subscribe to:
Post Comments (Atom)
दुर्ग से प्रिया गुप्ता की रचना- चाहत
कवि-प्रिया गुप्ता जिला- दुर्ग राज्य-छत्तीसगढ़ शीर्षक-चाहत विधा-काव्य संपर्क-7974631528 दीवानगी दीवानों की वफ़ा है दोस्तो काति...
No comments:
Post a Comment