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पिता के संघर्षों का कैसे मैं करूं बखान।
अपनी हर अभिलाषा को करता है कुर्बान।।
वह जड़ है परिवार का रखता सब को संभाल।
पिता से ही तो रहता है जीवन सबका खुशहाल।।
देव तुल्य वह है जग में करूं उसका गुणगान।
पिता के संघर्षों का कैसे मैं करूं बखान।।
डांट डपट में प्यार है हर क्रोध में है सीख।
सारी जहां का सुख हो दे दे सकता तकदीर जो लिख।।
बरसात में वह छतरी है जाड़े की गरम रजाई।
गर्मी में ठंडी हवा देता है सुखदाई।।
छूट नहीं सकता कोई कर्ज पिता तो है महान।
पिता के संघर्षों का कैसे मैं करूं बखान।।
शिक्षा दीक्षा धर्म-कर्म शिष्टाचार सिखाता है।
हर लेता वहां सारा क्लेश जैसे पूज्य विधाता है।।
आदर्शों के पालनहार सद्गुण हमें सिखाया।
छोड़ो ना पिता को बीच मझधार जिसने पार लगाया।।
जैसा करोगे वैसा ही भरोगे तेरा भी होगा संतान।
पिता के आदर्शों का कैसे मैं करूं बखान।।
रचनाकार✍
कवि.कमलेश कौशिक
😂कठलहा😂
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