नन्हे कदमों से चलकर
उंगलियां जिनकी थामकर
चलना था सीखा मैंने
पिता ! वो तुम ही हो ........
जब कभी जी घबराया
जरा-सी धूप से मैं मुरझाया
मिली थी जिनकी शीतल छाया
पिता ! वो तुम ही हो ........
मां ने कभी डांटा-फटकारा
निंदिया ने भी जब दामन चुराया
प्यार की थपकी दे जिसने सुलाया
पिता! वो तुम ही हो........
कांटों से भरे पथ में बढ़ना
सच को चुन झूठ से लड़ना
जीवन मंत्र है जिसने सीखाया
पिता ! वो तुम ही हो.......
भीड़ में कहीं जब अकेला पाया
चहुं ओर अंधकार ने जाल
बिछाया
दिव्य प्रकाश जिसने था दिखाया
पिता ! वो तुम ही हो........
जीवन के हर मोड़ पर
राह के टेढ़े-मेढ़े छोर पर
आदर्शों ने जिनके राह सुझायें
हे पिता ! वो तुम ही हो
वो तुम ही हो
वो तुम ही हो ।
जितेश्वरी साहू ✍
No comments:
Post a Comment