Sunday, June 9, 2019

छत्तीसगढ़ी गीत- खांसी रे by गुणेन्द्र सिंह पोर्ते "अविराम"

क‌ईसे आवथे मोला खांसी रे।
तभो ले तो खावथो बासी रे।

मोरो क‌ईसे म चलहि ना रे पुरखौती,
खोजथों सगा न‌ई मिलथे कोनो पुछौती,
अव‌ईया-जव‌ईया मनह बोलत रहथे,
रहि-रहिके आवथे येमन ल हांसी रे।
क‌ईसे आवथे मोला.........

जेखर घर म गेहों मांगे ल,
रद्दा देखादिस जा आगे ल,
गिंजर-गिंजरके तोला में देखेंव,
न‌‌ई जमिस तोर हमर रासि रे।
क‌ईसे आवथे मोला........

लग जाही रे मोला बुढ़ापा,
त कोन कहि रे हमला पापा,
नान्हें ल‌ईका ल देखत रहिथों,
त मन म आ जाथे रोवासी रे।
क‌ईसे आवथे मोला....…..

जेमा खेलेंव मेंहा भंवरा बांटी,
ओहर फिंगेशर के आवय माटी,
गुणेन्द्र हाबे जेखर नाव गा संगी,
अब तो यहू ल आवथे ओंघासी रे।
क‌ईसे आवथे मोला........

रचनाकार- *गुणेन्द्र सिंह पोर्ते "अविराम"
फिन्गेश्वर गरियाबंद छत्तीसगढ़*
🙏🙏🏵️🏵️🙏🙏

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