Saturday, June 1, 2019

कुण्डलिया छंद :- by विरेन्द्र कुमार साहू

बेटी  पहुना  बन  जथे , जब बिहाव हा होय।
मन मा नोनी सोच के , कलप कलप के रोय।
कलप कलप के रोय , दुःख के  आँसू  भारी।
कहे  जनम  का देय , विधाता  अबला  नारी।
सुख  के   दे  भंडार , भरौ   खुशियाँ ले पेटी।
करौ  मान  सम्मान , होय  जब  पहुना  बेटी।।

छंदकार :- विरेन्द्र कुमार साहू

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