की चलो नया एक सहर बनाते है
सब मकान बनाए तो हम घर बनाते है
बड़ी वीरान सी लगने लगी है मेरी हवेली
चलो अब वक्त आ गया हमसफर बनाते है
की दुनियां का तो सैर कर लिया हमने
कुछ से मोहब्बत कुछ से बैर कर लिया हमने
की अब तो मेला भी वीरान सा लगता है
ये सिरफिरा जाने क्यों परेशान सा लगता है
की मेरे जिस्म की जख्म को भी कुरेदने लगे
बाजार क्या निकला लोग मुझे ही खरीदने लगे
मैं बेसक हारा तो मगर हौसला जिंदा रखा था
उड़ने के लिए एक जख्मी परिंदा रखा था
और देख के जब मेरा गम दुनिया मुस्कुराने लगा
मैं भी दिल मे हाथ रख कर खुद को समझाने लगा
जब मेरे अपने ही मेरे लिए जहर बनाने लगे
तो फिर हम भी अपने लिए घर बनाने लगे
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गौरीशंकर कश्यप "सिरफिरा"
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