Thursday, June 20, 2019

पागल बनावत हे by पुरुषोत्तम चक्रधारी सूर्य

लइका राहय ते सियान
फेर नई हे काकरो धियान ।
सब मोबाइल चलावत हे
सबके मोबाइल घन घनावत हे।
सब इही मा झपावत हे
एक ले सेख मोबाइल देखावत हे।
आजकाल मोबाईल सब ला
पागल ............................................!

न बुढ़वा लागे न जवान
सब कर है वो मोबाइल खोखा के गियान।
ना डोकरी लागे ना छोकरी
सब मारतत हे सेखी ।
सब अपन नाक ला कटावत हे
कोनो लल कोनो नहीं भावत हे।
आजकल मोबाइल सब ल
पागल ...............................................!

दिन तिथि कैलेंडर पंचांग नवावत हे
का एतवार का सम्मार कोनो ल नी भावत हे।
महतारी अऊ बेटा के रिस्ता
बाप बेटा के रिस्ता
मनखे मनखे के रिस्ता दूरिहावत हे ।
बरजे ले कोनो नई मानत हे
सब ला एक मई सानत हे।
आजकल मोबाइल सब ला
पागल बनावत हे ।

तरिया नंदिया कछार डोंगरी
सब सुन्ना सुन्ना लागत हे।
खेत खार डोली भी बियारा
सब परिया परत हे ।
बिना हियाव सब सरत हे
अंतस के पीरा  को ला नी जनावत हे।
कोनो न कोनो नहीं भावत हे
आजकल  मोबाइल सब ल
पागल ...........................................!

मूड़ मा गघरी कारी संवरेगी
बाखा दबाए लइका लइकोरी ।सुवारी के चूल्हा फूंकई
खुनूर खुनूर चुरी बजई ।
परोसिन के आगी मंगई
चऊक मा बबा के बीडी़ सुपचई
सब बिसरावत हे।
आजकल मोबाइल सब ला
पागल .......................................!

पुरुषोत्तम चक्रधारी सूर्य
पांडुका गरियाबंद

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