विषय - बेटी
विधा - दोहा
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बेटी है नाजुक कली, मात पिता की शान l
व्याधि को करे दूर वह, सुंदर-सुंदर काम ll
साथ पवित्र विचार है, जैसे ये आकाश l
आंखों में रहती दया, करे पाप का नाश ll
ईश्वर का दिया हुआ, बेटी है वरदान l
आगे वह बढ़ती हुई, रखती सबका मान ll
लोग हैं खुशनसीब वह, जिसके घर संतान l
हासिल हो मंजिलें, जब बेटी हो जान ll
रचनाकार :-
बालकवि भास्कर वर्मा "उमंग"
(छत्तीसगढ़)
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