नगर का मार्केट,इधर-ऊधर, जिधर देखों लोग सब्जी लेने में व्यस्त थे। बाजार में ही दो व्यापारी ठेलें में रूपयों के नोट बेंच रहे थे। "आओ, आओ... नोट ले..लो..नोट ले..लो ताजे ताजे नोट ले लो", दोनो आवाज पे आवाज लगा रहे थे। एक व्यापारी के ठेले में भारी भीड़ दिखाई दे रहा था और दूसरे के ठेले में सन्नाटा पसरा था। किसी ने पूछा- " क्यों भईया! आपके रूपयों के नोटों को कोई नहीं ले रहा है?? कोई कारण है क्या??
व्यापारी मुस्कुराते हुए बोला- "भाई, मै इन रूपयों के नोटों को प्रति किलो ईमानदारी के भाव से बेंच रहा हूं। सामने वाला प्रति किलो बेइमानी के हिसाब से..! बांकि आप समझदार हैं.... इसलिए थोड़ा मंदी में चल रहा हूं।"
✍पुखराज प्राज

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