ओम जय मोबाईल देवा,
स्वामी जय मोबाईल देवा।
संत असंत जन निसिदिन,
पाए तेरी सेवा।।
जो जन तुमको सेवत,
परम् सुख पाता।
बिन नेटवर्क के मानों,
बहुत दुःख पाता।
तुम बिन सुबह न होती,
शाम नहीं होता।
बिन तेरे लोगों की,
काम नहीं होता।।
तुम देवा कलयुग की,
हो अंतर्यामी।।
तुम हो दूर दृष्टा,
हो तुम द्रुतगामी।।
सुख में दुःख में हरपल,
तुम देते हो साथ।
मिलन अरु बिछुड़न में,
अब होते तेरो हाथ।
जो जन तुमको ध्यावे,
हर सुख वो पाता।
गुगल और यू ट्यूब से,
सब दर्शन हो जाता।।
मोबाईल तेरी महिमा,
जग में अपरम्पार।
जल थल नभ में समाया,
तेरो रूप हजार।।
तुम बिन ज्ञान न मिलता,
होता न व्यापार।
तुझ पर ही तो टिका है,
दुनियाँ का व्यवहार।।
मोबाईल की सेवा,
जो जन नित पाये।
कहत प्रखर सुनो साधो,
ज्ञानी वो कहलाये।।
रचनाकार
श्रवण कुमार साहू,"प्रखर"
राजिम,गरियाबंद(छ. ग.)
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