जिला- सरगुजा
राज्य- छत्तीसगढ़
विषय- वृक्ष
शीर्षक-वृक्ष की महत्ता
विधा- काव्य
मो.नं.-9131850712
*वृक्ष की महत्ता*
ऐ मूर्ख मानव तू क्या सोच रहा
काट दिए मेरे हाथ????
नहीं!
तुमने काटे हैं स्वयं के हाथ
अपने पांव पर मार रहा कुल्हाड़ी
हाय!तू कितना है अनाड़ी,
जिस डाली पर तू झूलता था झूले
बैठता था उसकी छांव में,
ठोकर मार दी तूने उसी ठांव में!
ईंट कंक्रीट का बिछा कर जाल
वनों को कर दिया हलाल,
अपनी धरा को बहुत रुलाया है
हजारों पंछियों का था जो बसेरा,
काट नीड़ उनका उजाड़ा है।
कहां से मिले शुद्ध वायु
स्रोत ऑक्सीजन का गंवाया है,
बड़,पीपल,तुलसी काट-काट कर
कैक्टस बहुत उगाया है।
मानव ने उतार दी मानवता
शैतानियत का पहना जामा है,
स्वार्थ के हुआ वशीभूत
भला बुरा नहीं सोच पाया है।
आज उसको दिखता जीवन सुखमय
भविष्य नहीं देख पाया है
बच्चों के भविष्य के लिए बचाता धनराशि,
क्या बच्चों के लिए पर्यावरण बचाया है??
अब भी चेत जाओ ओ मूर्ख मानव
प्रदूषित हुई धरा को बचाना है
खूब पौधे लगा,उन्हें वृक्ष बनाना है!
विकास के नाम पर काटे गए
वृक्षों की भरपाई कराना है
आओ सब मिलकर लें संकल्प यही ढ़ेरों पेड़ लगाना है!!
शशि मित्तल "अमर
मौलिक एवं स्वरचित
बतौली, सरगुजा (छत्तीसगढ़)
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