Wednesday, June 16, 2021

कर्नाटक से डॉ. वसुधा पु. कामत कृत : अजीब सी मुलाकात थी उससे!

डॉ. वसुधा पु. कामत
राज्य :- कर्नाटक
शीर्षक:- अजीब सी मुलाकात थी उससे.......! 



    बस अब तो  भारत बंद का ऐलान किया जा रहा है, टीवी पर एक जगह कोरोना का कहर, एक जगह बंद का ऐलान ,एक जगह शाहीन बाग का सत्य, एक जगह कोरोना से पूरे विश्व में हो रहा मौत का सैलाब , तो एक जगह नक्सलवाद का दहशद ......अनेक चैनल , अनेक खबरें ...... कौनसा चैनल लगाऊ , कौनसा छोडू, .......इधर वाट्सएप, फेसबुक , इनस्ट्राग्राम आदि पर कोरोना का सैलाब .......... इन सब में मेरा दिमाग-दिल, सोच विचार मे खिचडी पक रही थी ।  उतने में प्रधानमंत्री मोदी पा जी  " टीवी पर, वाट्सएप पर,  हम सबसे यह कहते हुए नज़र आ रहे थे ,  "कोरोनापर रोख लगाना है , तो भारतवासियों मेरे प्यारे भाई और  बहनों कल रविवार,  जनता कर्प्यू का समर्थन करें, शाम 5 बजे उन सबका एहसान माने,  जिन्होंने भारत के कोरोना ग्रस्त लोगों की निस्वार्थ भाव से सेवा की है। उनका तालीयों से, घंटा नाद से,शंख नाद से उनका आभार व्यक्त करें और उनका हौसला बढाये । यह सब सुनते- सनते, देखते-देखते दिमाग का परदा सरक गया । मेरी नजरों के सामने एक ऐसा मोहल छा गया की , एक बडे़ सभांगण में बहुत सारे लोग बैठे है , स्टेज सजा हुआ है , बड़ी बड़ी हस्तियाँ सामने बैठी है । सभी  ने मास्क भी पहन रखें है यह सब देख ही रही थी ,कि स्टेज पर मेरा नाम पुकारा गया । अब थोड़ी ही देर में एक छोटी -मोटी हिंदी साहित्यकार डॉ. वसुधा यहाँ पर उपस्थित होंगी और आप सबसे एक ऐसे बड़ी हस्ति से मुलकात लेंगी ।....... पहले छोटी-मोटी हिंदी साहित्यकारा का इस मंच पर बड़े जारदार तालियों से स्वागत करें । ... मैं घबरायी , मायूस, अज्ञानी ....पता नही जैसे तैसे मुखपर झूठी हँसी लेकर मंच पर उपस्थित हो गयी । मन मे डर, दिल की तेज धडकन समय के काँटे की तरह घूम रही थी ........। पहले पहले तो मेरी आवाज़ निकली ही नही ..... फिर क्या हुआ मुझे पता ही नही चला कि, मैने ताली बजाते बजाते ये कह दिया .."मेरे प्यारे रसिक हो , आज हम एक ऐसे व्यक्ति से मिलने जा रहें जिसने अपना अस्तित्व चीन से पाया है। पूरे विश्व में कम दिनों मे ही तहलका मचा दिया है । तो पता चला प्यारें सुधी जनो हाँ या ना , .. तो.... तो...... मै इस मंच पर उस बडे़ हस्तिका स्वागत करती हूँ........ओ.....ओ....हैं.......जानेमाने......हम सबके जान लेनेवाले.......चीन का वरदान..... श्री.....श्री..... कोरोना जी का , जोरदार तालियों से स्वागत कीजिए।............कोरोना जी मेरी तरफ से और इन सबकी तरफ से आपका भारत के इस मंचपर स्वागत है ।


कोरोना :- ......  मैं भारत और भारतवासियों का बहुत बहुत आभारी हूँ । आप जैसा स्वागत-आवाहन खुद मेरे पितामह चीन ने भी नही किया डॉ।। वसुधा जी , जैसा आपका राजा है , वेसी ही आपकी प्रजा । हा हा हा हा......।
भारत म...हा...न .... है ।

वसुधा :-  कोरोना जी आइये.... अपने आसन पर विराजमान हो जायें । मेरा अहो भाग्य है, मैं आप  जैसे हस्ति की मुलाकात करवाने का मौका मिला है ।

कोराना:- ओह ....ओह... क्या बात है वसुधा जी क्या बात है । आपको मुझसे ड़र नही लगता । मैं एक संक्रमिक हूँ और ऐसे में आप मेरी मुलाकात ले रही हो ..... आप तो महान है वसुधा जी ..... हा हा हा हा.........हा...।

वसुधा :- तो कोरोना जी ,तो हम  सवाल पूछें .........

कोरोना :-  क्यूँ नही ..... क्यूँ नही

वसुधा :- तो पहला सवाल , कोरोना जी आपका जन्म चीन में हुआ यह पूरा विश्व  जानता है , पर जब आप पैदा हुए और आपको छुपाया गया इसके पिछे का मक्सद क्या था?
हा...हा...हाँ .... आप यही मानकर चले कि, यह एक कूट नीती थी और है चीन की, क्यूँकि शायद हर जगह तबाही मचे , हाहाकार मचे और भारत को सबब मिले ...।

वसुधा :- अच्छा तो आपको ,यह सब करने अच्छा लगता है ?

कोरोना :- नही वसुधा जी , पर मैं बाध्य हूँ । मुझपर दड़पन आता है , मै भी तो रोता हूँ .... पर मानेगा कौन ? 

वसुधा :-  अच्छा , तो आपको भी दिल हैं कोरोना जी ।

कोरोना:-  बडे़ दबे स्वर में , हाँ जी , मुझे भी दिल है पर जिसने मुझे बनाया है वही बेदर्दी है जी, मै नही वसुधा जी ......।

वसुधा :-  तो अब बतायें आप कहाँ कहाँ पर होकर आये है ?
कोरोना:- चीन के वुहान के बाद धीरे धीरे ...... मैं इटली में, स्पेन में, जर्मनी, बेल्जियम, इराण, इराक, अफगानिस्तान, पाकिस्तान, ..........ऐसे करते करते आखिरकाल भारत में आ ही गया वसुधा जी ..... मेरी बहुत ईच्छा थी भारत आने की ....हा....हा...। 


वसुधा:- ओह... कोरोना जी आप हस्ते बहुत है .......
कोरोना :- अरे! भारत आके मेरी हँसी कम हो गयी है वसुधा जी.....

वसुधा:- अरे वाह, क्या बात है कोरोना जी ..... वाह क्या बात है ....ऐसा क्यूँ?

कोरोना:- भारत ही ऐसा सुसंस्कृत देश है । यहाँ अच्छे बुरे ... सबका स्वागत होता है और पूरे सम्मान के साथ भी विदा मिलती है ....हँसी थम जाती है और आनंदश्रु बहने लगते है ........ मेरे पास कोई शब्द नहीं वसुधा जी ।

वसुधा:- तो अब यह बताने की कृपा करें कि, आपका तोड़ ,आपके पितामह के पास नही था ?


कोरोना :-  वाह.... वसुधा जी.. वाह.... आप भी.......... अरे!वसुधा जी जिसने मुझे जन्म दिया ,क्या उसके पास तोड़ नही होगा !..... है ..तोड़.. है तभी तो,81000, संक्रमित लोगों में सिर्फ 3442 की मौत हो गयी है ... तो आप ही समझ लें .....आप इनकी तुलना इटली और बाकी देशों से करके देखें समझ में आयेगी ।

वसुधा:- ओह  यह बात है .... ठीक है ।  कोरोना जी भारत आकर आपको कैसा लगा?
*कोरोना:* इधर आने से पहले मैं थोडा़ ड़रा था क्यूँकि ..... यहाँ पे पहले से ही मेरी मृत्यू तय हो गयी है यह मैं जानता था .....पर भारतवासियों से मैने सीख लिया है , ड़रना नही है और ऐसे भी मैं अब थक चूका हूँ ...... बहुतों को मृत्यू लोक पहुँचा चूका हूँ ...... अब मैं यह पाप नही करुँगा .... भारत के पूण्य भूमि पर आया हूँ । मेरे पाप धूल जायेंगे , यहाँ की आवभगत देखकर मेरे नयन भीग ही गये थे । वसुधा जी आप लोग बहुत ही पूण्यवान है, जो इस धरती पर रहती हो ..... बुराई का अंत होना ही है , तो भारत आकर अपने पाप धुलकर मोक्ष प्राप्ति ही है और मै अपने आपको खुशनसीब समझता हूँ वसुधा जी....जैसे यहाँ पर अनेक महामारी आयी और हार मान ही गयी है ना ....तो.....तो....तो... मेरा अंत समय आ गया , मैं उसी समय जान गया जब मैने भारत में कदम रखा । मैं ....तो..... हँसी खुशी अलविदा लूँगा......मैं..... उनका आभार मानना चाहता हूँ , जो आपकी इतनी चिंता करता है, आप उसका साथ दो या ना दो वह आपके दुख दर्द में खडा़ रहता है वैसे  भी भारत एक महान राष्ट्र है ........यहाँ के संस्कार, संस्कृति महान है । ऐसे देश को, ऐसे मातृभूमि को और उन सभी सज्जनों को जो संक्रमित लोगों की सेवा अपने जान से खेलकर कर रहें हैं.........अरे!देखो मेरे आँसू भी निकल आयें है .......चलो वसुधा जी अलविदा लेता हूँ । 

वसुधा :-  जी आप यहाँ आये, अपने मन की बात कही अच्छा लगा , हम सब मिलकर आपको अलविदा कहते है .....अलविदा कोरोना जी ......अलविदा.....। 
 तो मेरे प्यारे भाई बहनों तहदिल से आभार, बडे़  शांतिपूर्वक आप लोगों ने हमारा संवाद ....... फिर मिलेंगे नये विचारों के साथ ..।नमस्ते...... शुक्रिया........ फिर मिलेंगे कहते कहते मेरे दिमाग का परदा गीर गया और ....बड़ी अजीब सी मुलाकात थी मन ही मन हँसते..... हँसते .......... मैं अपने कार्य में जूट गयी .....। 


डॉ. वसुधा पु. कामत

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