सुंदरगढ़, ओडिसा
विधा-काव्य
विषय-प्रहरी
वो पहला दिन हो कॉलेज का
या था आखिरी साल
भँवरे की तरह मंडराता था
वो प्रहरी था कमाल
उद्देश्य ही था मानो उसका
रखना मेरा ख्याल
परछाई भी ना पड़ने देता मुझपर
काट देता हर जाल
भँवरे की तरह मंडराता था
वो प्रहरी था कमाल
हर बुरी नज़र से बचाता
टूट पड़ता था बनकर काल
उँगली उठे किसी का मुझपर
ना था किसी में इतना मज़ाल
हर ख़ौफ़ से बेखौफ थी मैं
क्योकिं वो था ही बेमिसाल
हौसले बुलंद थे उसके
पर था ना कोई चाल
वो सजग प्रहरी था मेरा
अपलक हाथों में लिए मशाल
खो देने का एहसास भी
मानो था उसके लिए काल
उसका प्यार बंधन लगता था
नासमझ मै भी थी कमाल
समझ ना पाई मुहब्बत उसकी
अब बस यही है मलाल
भँवरे की तरह मंडराता था
वो प्रहरी था कमाल।।
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