Saturday, April 10, 2021

मीराआर्ची चौहान की रचना- खगंगा

रचयिता-मीराआर्ची चौहान
जिला-कांकेर,छग
शीर्षक-खगंगा
विधा- कविता(मुक्त छंद) 

व्योम गंगा में टिम-टिम करते
असंख्य तारे  मन को लुभाते।

दूध के मंदाकिनी में तैरते हुए
अकूत तारे मंद-मंद मुस्काते।

खगंगा की कोख में ये सप्तर्षि,
ध्रुव तारा,ग्रह ,नक्षत्र  हैं हर्षाते।

गैलेक्सी के अद्भुत हैं  ये नजारे,
चाँद ,सूरज,उल्का ,पुच्छल तारे।

आकाशगंगा में झिलमिल सितारे,
पौ फटते जाने किधर छिप जाते ।

स्वर्ग नदी के अलौकिक ये सितारे,
खगोल को हैं चमत्कृत कर जाते ।

आओ धरती को नभ-गंगा  बनाये,
सितारों-सा हम कर्मपथ चमकायें।

मीराआर्ची चौहान
कांकेर,छग
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