जिला-कांकेर,छग
शीर्षक-नींद
विधा-कविता (मुक्त छंद)
बचपन में निंदिया
रानी को बुलाने
माँ को लोरी रोज
लोरी गाना पड़ता है ।
युवा होने पर निद्रा से
हर शख्स को हर
दिन जबरदस्ती
जगाना पड़ता है ।
बुढ़ापा हर दिन ही
बहुत रुलाती है,
नींद को जबरन
बुलाना पड़ता है ।
एक दिन निंदिया रानी
बिना बुलाये आती है
बिना लोरी गाये वह
धरा में सुला जाती है ।
मीराआर्ची चौहान
कांकेर,छग
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