जिला - बलौदाबाजार (छ. ग.)
विषय - एकलव्य
विधा - छंदमुक्त कविता
शीर्षक - " वीर एकलव्य "
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था वो पराक्रमी महान धनुर्धारी।
गुरुभक्त और गुरु की आज्ञाकारी।
एकलव्य,अभिद्युम्न नाम जिनके,
कहानी से अवगत दुनिया ये सारी।।
पुत्र वो राजा हिरण्य के।
गाथा गाऊँ मैं एकलव्य के।
निषाद पुत्र थे वीरों के वीर,
सर्वश्रेष्ठ उदाहरण इच्छाशक्ति सभ्य के।।
महाभारत की एक कथा आपको मैं सुनाता हूँ।
वीरता की ओ कहानी फिर से मैं दोहराता हूँ।
धनुर्विद्या की शिक्षा पाने आये थे द्रोणाचार्य-आश्रम,
गुरु-शिष्य की अटूट प्रेम आपको मैं दिखलाता हूँ।।
कारण निषादपुत्र के न पायी शिक्षा धनुर्विद्या की।
इनकार किया गुरु द्रोण ने फिर भी प्रतिज्ञा की।
गये वन को बनाये गुरु द्रोण की मूर्ति ,
किये अभ्यास, फिर हासिल विद्या की।।
साधना की एकाग्रचित से,
फिर धनुर्विद्या में निपुण हुये।
सीखी धनुष-बाण की हर कला,
परिश्रम से ही अंततः परिपूर्ण हुये।।
आखेट करते एक दिन पाण्डव,
पहुँचे एकलव्य के आश्रम।
दंग हुये धनुर्कौशल देखकर,
नहीं थे कोई अर्जुन से कम।।
अंगूठा काटकर एकलव्य ने,
द्रोणाचार्य को दिया गुरुदक्षिणा।
असंभव को भी संभव कर दिखाया,
महान धनुर्धर बने गुरु के बिना।।
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मौलिक रचना ( स्वरचित )
संतराम कुम्हार
बलौदाबाजार (छ.ग.)
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