जिला-कोरबा, छ.ग.
विषय- सरहदें
विधा-छंदमुक्त कविता
शीर्षक-सरहदें
----आओ हम धरा को बांटती हर रेखा
को मिटाते जाएं ,
हर इंसानों के दिल में, भाईचारे का बीजारोपण करते जाएं ।
ईश्वर के रचित सृष्टि में , सर्वोपरि जीव हैं हम ,
अपनी इस श्रेष्ठता को , सार्थक बनाते जाएं ।
आओ धरा को बांटती हर रेखा को मिटाते जाएं ।
फिजाओं संग घुलित होकर सभी सरहद को भूलते जाएं ,
वसुधा के प्यारे उपवन को ,फूलों के
खुशबू से महकाते जाएं ।
पंछियों की भांति ,
धरती के हर कोने को मधुर कलरव के संगीत से भर जाएं।
आओ हम धरा को बांटती हर रेखा को मिटाते जाएं ।
वसुधैव कुटुम्बकम के सूत्र को पुनः स्थापित करके
दिल को दिल से जोड़ जाएं ,
आओ हम धरा को बांटती हर रेखा को मिटाते जाएं ।
।।इति।।
" गोमती सिंह "
कोरबा, छ. ग.
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