Monday, February 15, 2021

नलिनी बाजपेयी की रचना- बसंत पंचमी

रचनाकार-नलिनी बाजपेयी
संबलपुर,जिला-कांकेर, (छ. ग.)
      विषय-बसन्त पंचमी     




            *बसन्त-पंचमी*

इठलाती, बलखाती,आई बसन्त बयार,
हौले-हौले मन मेरा डोले,मुदित हुआ मन यार।     
               
गिरि,पर्वत,वन,उपवन को भा गई बयार,
महक उठी,चहक उठी आज बसन्ती नार।

सुरभित हुई तरू वल्लरी,भौंरा करें गूँजार,
कोयल कूके,विरहन तरसे,मन में उठे खुमार।

विहग वृन्द,कलरव संग,प्रमुदित हुआ आगार,
पीत परिधान धारे,सरसों नाची,मलय गंध कर शृंगार।

मधुर,मधुमासी पलाशी,उड़े रंग गुलाल,
प्रकृति कर बैठी बन सँवर,धरा हो गई इंद्र धनुषी रक्तिम लाल।

ढोल मंजीरे की थाप पड़ी,मदमस्त राग मल्हार,
टूटे प्रेम लड़ियाँ बिन साजन कहती अकथ बतियाँ कर मनुहार।

पवन बसन्ती सिहरत तन और भीगे हैं रतनार,
धानी चूनर धरा ओढ़े,मधुप कर रहे अनहद गूँजार।

वन,उपवन,नन्दन वन,विपिन बरसाए पलाशी अंगार,            
तन झूमें,मन झूमें वीथिका फूले,बावरी हुई फाल्गुनी बयार।

इठलाती बलखाती,आई बसन्त बयार,
हौले-हौले मन में डोले,मुदित हुआ मन यार।
        
     नलिनी बाजपेयी
 संबलपुर,कांकेर,( छ.ग.)

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