Monday, February 22, 2021

मोनालिसा बेहरा की कविता- मुस्कुराहट

रचियता-मोनालिसा बेहरा
सुन्दगढ़, ओडिशा
विधा-काव्य
विषय-मुस्कुराहट

किसी की जीने की वजह बन जाऊं
औरों के सपनों को मुक्कमल कर पाऊं
दिक्कतें हजार हों भले जीवन में
चाहत है होंठो पे मुस्कुराहट बन खिलखिलाऊँ

अपने बातों ,इरादों से रुलाना आसान है
दुखती रगों को छू जाना भी मुमकिन है
चाहत है दुखों को बांट  अपना बना लूं
मुरझाए चेहरे पे मुस्कुराहटें सजाऊं

जब -जब तुझे मुस्कुराते देखा है
गहरे घावों को भी भरते देखा है
निश्छल, निष्कपट मुस्कुराहट से
मेरे झोपड़ी में खिलता गुलाब देखा है

इतनी सी ख्वाहिश है अपनी
जिन माँ-बाप ने ये जीवन दिया है
कुछ और उन्हें ना दे पाऊं भी तो
उनकी मुस्कुराहट की बस वजह बन जाऊं

चेहरे की भर आईं झुर्रियों में भी
माथे पे पड़े चिंता की लकीरों में भी
जब -जब मुस्कुराहट खिलती है
फूलों के बागीचे में भी ऐसी सुंदरता ना मिलती है।।

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