स्थान --नवापारा खुर्द /सक्ति
जिला --जांजगीर-चांपा /छत्तीसगढ़
विधा--- कविता/ आलेख
विषय --प्रस्तर
शीर्षक--- प्रस्तर की कला
देख मेरे प्रस्तर की कला, तूने आंख मूंद लिया ।
मैंने भी देखने वाला , कोई और दूसरा चुन लिया ।
तुझको नहीं सुहाता,तो मुझको कहां भाता ।
तेरा व्यवहार जैसा,वैसा ही मिलेगा मेरा नाता ।
कैसे तुझको सुख दूं,जब तुने मुझको दुख दिया ।
यहां फूलों की नगरी है ना, कांटों की बस्ती ।
ए जीवन है जीवन,जिसकी होती है हस्ती ।
जो दिखाया मुझको, तूने वैसा मैंने रुप दिया ।
देख मेरे प्रस्तर को,जो बनकर उभरा है ।
सोच ऐसे बनने के लिए,इस पर क्या गुजरा है ।
दिया है मुझको सब कुछ ,इसने कुछ नहीं लिया है ।
जो कुछ नहीं लेते उनकी श्रेणी,प्रथम पूज्य होती है ।
लेने वालों को देखकर,उनकी अंतरात्मा रोती है ।
दोनों को देखते देखते, मैने भी जीवन जीया है ।
प्रस्तर पर मैंने जो आकार उकेरें है, देखते ही सब बन रहे ।
मानव का मन नहीं बदल पाया, बदलने को मेरा मन कहे ।
कुछ तो है जिनका जीवन मेरे द्वारा , सचमुच बदल दिया है ।
आकाश भी इस बात से अनभिज्ञ,जो सबके सर पर है ।
धरा तो जान ही जाती, अपने पथ अपने कार्य पर है ।
निर्जीव को आसान बदलना,सजीवों के लिए कठिन क्रिया है
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