Monday, February 8, 2021

अनुरमा शुक्ला की रचना- प्रस्तर

रचनाकार- अनुरमा शुक्ला
स्थान- दुर्ग (छ.ग.)
विषय- प्रस्तर
शीर्षक- नींव का पत्थर


मजबूत है कठोर है बनता यही आधार,
ऊँचे ईमारत और महल टिकते इसकी नींव पर,
सहते जाता कितने चोट, कितने प्राकृतिक प्रहार,
दर्द का अहसास नहीं, क्योंकि यह तो है... निर्जीव प्रस्तर ।

यही ज़ुल्म जब हो नारी पर, बन जाती वो सजीव पत्थर,
चोट सहती वो कोमल हृदय  घर पर तानों की बौछार, तो बाहर शैतानों की गंदी नज़र,
कहीं बनती बाज़ार की रौनक  सजधजकर वो मजबूर लुभाती फिर..
भूख हौवानों की मिटाती
देती रहती सदा अपने वजूद की आहूति ।
होते रहता सब-कुछ तार-तार, मन भी छलनी बारम्बार ।

मानते जिसे देवी हो,करते पूजा घर-घर, वह भी तो है एक पाहन,
जाने कितने मन्नत के धागे, बाँधे जाते इसकी चौखट पर,
फिर क्यूं समझ ना पाये मूरख नारी है जीती जागती ईश्वर की ही मूरत ।
हर दर्द का मरहम है,भावुक है नाजुक है, नहीं है उसका दिल पत्थर 
श्रृष्टि का सृजन है, देती तुझको जनम है,
फिर क्यों करते अत्याचार, ममत्व को करते हो बेज़ार,
जिस पर सारा जीवन टिका चले सारा संसार,
है वही स्त्री ही मानव जाति की ...नींव का पत्थर ।।

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