Thursday, February 11, 2021

लीलाधर कुम्हार की रचना- जंगल

रचनाकार -लीलाधर कुम्हार
जिला - बलौदाबाजार (छत्तीसगढ़)
विषय - जंगल
विधा - छंद मुक्त कविता
शीर्षक - डरो नही जंगल से
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     // डरो नही जंगल से //

दुनिया है जंगल की झाड़ी ,
बीहड़ पथ काँटों की बाड़ी ,
नहीं रुकेगी जीवन - गाड़ी ।

दुनिया है जंगल की खाई ,
भारी मुश्किल आवाजाही ,
 जीवन तो  गुजरेगी भाई ।

दुनिया है पथरीली पहाड़ ,
जहाँ समस्याओं की बाढ़ ,
फिर भी जीवन की दहाड़ ।

दुनिया भले ही जंगल है ,
जंगल मे करना मंगल है ,
जीवन का  यह दंगल है ।

जंगल हो या मंगल प्यारे ,
जीना है  उद्यम के सहारे ,
क्यों बैठे हो मन को मारे ?

डरो नहीं जंगल से यारों ,
मन के दुर्गुणों  को मारो ,
भक्ति से जीवन  सुधारो ।

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