विषय-किसान
दिनाँक-05.01.21
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*किसान*
धरा का वक्षस्थल चीर
बीज लगाता है,,
कड़कती ठंड,झुलसती गर्मी,
काली घटाओं से नहीं घबराता।
अन्नदाता है सबका
भरण पोषण करता,
आलस छोड़ दिन भर
मिट्टी में पला करता।
हरी भरी पगडंडियों पर
पड़ती जब सूर्य किरणों की छाया,
नव अंकुरित पौधों को
देख-देख किसान हर्षाया।
उषा की गोद समाया आदित्य
सब का मन हर्षित कर जाता,
सूरज की चमक,फूलों की महक
भरने किसान के जीवन में आता।
मन में उमंग लिए तरंगों भर
तन लिया बैलगाड़ी में आता,
कुछ पाने जग को कुछ देने
संकल्प भर प्रमुदित हो जाता।
दिनकर की बढ़ती धूप के
संग मेहनत करते जाता,
खुले खलिहानों में सोना
उपजाने का विश्वास जगाता।
गाँव की सोंधी मिट्टी उस पर
श्रम सीकर जब बहता,
धन्य धरा हो उठती दाना
स्वर्ण बन चमक उठता।
*व्याख्या*-प्रस्तुत कविता में किसान ठंड,गर्मी,बरसात की चिंता किये बिना,आलस छोड़ सबके लिए अनाज की व्यवस्था करता है।सुबह उठते ही खलिहानों में चला जाता है।
नलिनी बाजपेयी
संबलपुर,कांकेर,(छ.ग.)
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