निवास-बायरन बाज़ार,रायपुर ।
जिला-रायपुर, छत्तीसगढ़ ।
विधा-छ्न्द मुक्त कविता ।
शीर्षक-"राब्ता " ।
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●●●●~|राब्ता |~●●●●
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सबको राब्ता है,अपनी जिन्दगी से--
इन्सान हो या जानवर,
माता-पिता का राब्ता होता है,
अपनी संतानों से--।
श्रद्धा-भक्ति भाव होता--
भक्तों का प्रभु से-
धीरे-धीरे राब्ता हो ही जाता है,
एक दिन अपने ईष्ट से--।
पाल लेते हैं लोग कभी--
अनजान अनाथ बच्चों को,
हो जाती राब्ता उनसे,
वारिस जब उन्हें मिल जाता,
उस दर्द को भूलना होता मुश्किल--।
राब्ता रखते जो इन्सा --
अक्सर लोगों से,
मोहब्बत बढ़ जाती है,
हमेशा के लिए उनसे--।
पशु-पक्षियों के पालकों का--
राब्ता हो ही जाता है,
एक-दूसरे से एक दिन,
दिल से करीब आ ही जाते हैं--।
आओ राब्ता रख लें---
अपनी-अपनी जिन्दगी से,
कुछ अच्छा कर जाएँ,
इस जगत में ताकि--
गुजर जाने के बाद भी,
याद करता रहे ये जमाना--।
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व्याख्या--उपरोक्त रचना के माध्यम से यह कहना चाहता हूँ कि राब्ता हो अपनी जिन्दगी से तो जीवन का दर्शन ही बदल जाता है ।
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