संबलपुर, जिला-कांकेर, (छ .ग.) विषय-सायक,दिनाँक-08.01.21
*सायक*
तन में उठता
जब-जब आवेग प्रबल,
मन विचलित और
तन होता उद्वेलित।
तब जुबाँ से निकलते
शब्द रूपी सायक,
ज्यौं धनुष से छूटते जहरीले
बाण लगते प्राण के बन याचक।
शर,तीर,बाण साचक है
कहलाते,उल्फत में नजरों से नजरों के तीर है चलाते।
आज बम बारूद,पहले
तीर बाण थे हथियार,
विष बुझे तीरों से समर
में करते थे व्यापार।
रण में काँप उठते अरिदल
लड़ते होकर तैयार,
बड़े-बड़े धनुर्धर दुश्मन
संग करते तीरों से व्यवहार।
उल्फत में भी जाने कितने
माशूक ने जख्म है दिए,
कितने ही जहर बुझे
सायकों ने घाव हरे किए।
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नलिनी बाजपेयी
संबलपुर, कांकेर, (छ. ग.)
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