खैरागढ़,जिला-राजनांदगांव
राज्य-छत्तीसगढ़
शीर्षक- सुनता के डोर
विधा-छत्तीसगढी कविता
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सुनता मा रेहे ले,
अब्बड़ मुसकुल काम बन जाथे।
जुरमिल के जम्मो झन,
जब अक्कल लगाथे।
कतको बड़े बिपत ह,
झप ले टर जाथे।
सुनता मा रेहे ले,
जम्मो संसो फिकर ह भगाथे।
एकमई होके काम करे ले,
जब्बर पहाड़ घलो फुट जाथे।
जम्मो झन मिलके हमर देश मा,
सुनता के डोर ल ,मजबूत बनाबो।
के कोनो बैरी टोर मत सके।
सुनता के पक्की घर ल,
कोनो फोर मत सके।
बिना सुनता के अपने देश मे,
बइला कस फन्दाय रेहेन।
अपने घर में चोरहा ढोरहा कस,
अंधियारी खोली में धंधाय रेहेन।
जब सुनता के डोरी म ,
जम्मो झन बंधायेन,
जम्मो देशवासी मन मिलके,
बैरी मन ल मार भगायेन।
अपन सुनता ल अइसने बना के रखो,
सुखी जिनगी के सुवाद ल चखो।
कतको जोरलगहा बैरी आही,
हमर सुनता के डोरी ल,
टोर नई पाही।
छाती तान के आही अउ,
मुंहु लुकाके लहुट जाही।
सुनता के डोर ल ठोसलगहा बनाओ,
संघरा अउ सुनता मा रेहे बर,
लइका मन ल सिखाओ।
सब घर,परिवार ,समाज अउ देश म,
बड़े-बड़े बीपत अउ दुख घलो आथे,
जुरमिल के सुनता में रेहे ले,
अब्बड़ मुसकुल काम बन जाथे।।
🌺संदेश-
सुनता म बहुत ताकत होथे ,
जेन घर,परिवार,समाज,अउ देश म
सुनता हे,वो सब डाहर ले ठोसलगहा अउ अब्बड़ सक्षम बन जथे। अब के जम्मो लइका मन मे सुनता के भाव जगाना जरुरी हवे। प्रयास जरूर करन।
रचनाकार- महदीप जंघेल
खैरागढ़,राजनांदगांव
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