जिला एवं राज्य:-रायबरेली, उत्तर प्रदेश
शीर्षक:-भूली बिसरी यादें
विधा:-कविता
बचपन के सारे सपनों की तस्वीर सजा रखी है
उन भूली बिसरी यादों की ताबीज बना रखी है
घर के आंगन में हम सब जब मिल के जिया करते थे
अम्मा आजी की डाँटो को दिल से न लिया करते थे
उस डांट में भी हम अपनेपन को ढूंढ लिया करते थे
घर के आंगन में हम सब जब मिल के जिया करते थे
रिश्तों की मधुरता का तो आलम ये हुआ करता था
अतिथि किसके घर का है ये भी न पता चलता था
कल्लू के मामा जी हों या अब्दुल भाई की खाला
मिंटू के मौसा जी हों या परबिन्दर का साला
उन सब के आने की हम राह तका करते थे
घर के आंगन में हम सब जब मिल के जिया करते थे
गुल्ली डंडे की खट खट और कंचे की झन्नाहट
लुकम छुपाई के बीचो बिच मां के कदमों की आहट
उस आहट को सुन कर के जब हम कोने में छुपा करते थे
घर के आंगन में हम सब जब मिल के जिया करते थे
अब वो दिन भी गए वो लोग गए जो एक दूजे पे मरते थे
कोई कस्ट किसी पर आए तो सब एक हुआ करते थे
अब भाई ही भाई की आँखों को नहीं सुहाता
मामा मौसी फूफा काका अब कोई नहीं घर आता
अब दिल वो नहीं जो औरों की खातिर में जिया करते थे
घर के आंगन में हम सब जब मिल के जिया करते थे
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