Monday, September 14, 2020

सूर्य प्रकाश पाटिल कृत आलेख- हिन्दी

रचनाकार  सूर्य प्रकाश पाटिल
जिला बेमेतरा छत्तीसगढ़
विधा  आलेख
शीर्षक  हिंदी आज और कल

        हिंदी आज और कल
      हिंदी को हमारे राष्ट्र में राजभाषा का दर्जा प्राप्त है, हमारे भारत देश में हिंदी भाषी की बहुलता भी है और हमारे राष्ट्र को हिन्दुस्तान के नाम से पुकारा भी जाता है।
           एक ऐसे देश में जहां की जनता विश्व का प्रतिनिधित्व करती हैं जहां की शिक्षा, कला, संस्कृति, सभ्यता विश्व में अपनी जगह बनाए हुए है। आज उसी राष्ट्र में राजभाषा का कितना महत्व है??
           मै छत्तीसगढ़ प्रदेश से हूं। यहां प्राय हिंदी भाषा बोली व उपयोग की जाती है और जहां तक छत्तीसगढ़ की अपनी भाषा छत्तीसगढ़ी का वह भी हिंदी से मिलती जुलती है जिसे कोई भी हिंदी भाषी आसानी से समझ सकता है और कुछ दोनों के प्रयास में बोल भी पाता है। इसकरण छत्तीसगढ़ में प्रवासियों और पर्यटकों को विशेष परेशानी नहीं होती और वे यहां के माहौल वातावरण में अपने आप को ढाल लेते हैं।
           रहा हम हम हिंदी भाषी राज्य वाले लोगों का तो यहां अधिकांश मध्यमवर्गीय परिवार हिंदी भाषी हैं जब ये भारत के ही दूसरे प्रदेशों में जाते हैं खाश तौर पर दक्षिणी प्रदेशों में जाते ही तो उन्हें बहुत परेशानी होती हैं क्योंकि वहां अधिकांश लोगों को हिंदी आती ही नहीं।
            कहने का तात्पर्य यह है कि अपने ही देश की राजभाषा का ज्ञान यहां के बहुत से लोगों को नहीं हैं। यह सीधा सीधा हमारे राष्ट्र के राजभाषा कर अस्तित्व पर आघात है। इन राज्यो के शालाओं में हिंदी को अतिरिक्त विषय के रूप में रखा गया है। जबकि उस राज्य की भाषा या अंग्रेजी को प्रथम भाषा के रूप में रखा गया है।
                आज हमारे देश के अधिकांश शाला या कहें लगभग सभी शालाओं में अंग्रेजी को मुख्य विषय के रूप में रखा गया है और हिंदी को दूसरे स्थान या तीसरे स्थान पर। ऎसा क्यों? 
        क्या हम अपनी राजभाषा में पढ़ लिख कर एक सभ्य ,सुशील, सुसंस्कृति वान देश के नागरिक नहीं बन सकते। हमारे देश में बड़े लोग ही हमारी राजभाषा का हाल बेहाल करने में लगे हुए हैं। साल में एक दिन"हिंदी दिवस"एक सप्ताह का"हिंदी पखवाड़ा"मना लिया और समझते है बहुत बड़ा योगदान दे दिया।
                    आजकल तो अधिकांश सरकारी गैर सरकारी कार्यालयों में फॉर्म भी अंग्रेजी में भरना अनिवार्य कर दिया गया है।
             आज के महामारी के समय में भी जहां विश्व भारत की ओर आशा भरी दृष्टि से देख रहा है हाथ मिलाना छोड़ नमस्कार को, मांसाहार छोड़ शाकाहार को अपना रहा है, भारत की सभ्यता संस्कृति को अपना रहा है। ऐसे समय में वहां की हम भारतीय अंग्रेजी के पीछे भागे जा रहे हैं। बड़ा ही चितानिय विषय है आखिर कब हमारी राजभाषा हिंदी को उसका असली सम्मान दे पाएंगे हम.........
  सूर्य प्रकाश पाटिल

1 comment:

दुर्ग से प्रिया गुप्ता की रचना- चाहत

कवि-प्रिया गुप्ता जिला- दुर्ग राज्य-छत्तीसगढ़ शीर्षक-चाहत विधा-काव्य संपर्क-7974631528  दीवानगी दीवानों की वफ़ा है दोस्तो   काति...