०१. रचनाकार :- देवयानी शुक्ला
०२. जिला/राज्य :- रायपुर (छत्तीसगढ़)
०३. शीर्षक :- भागीदारी
०४. विधा :- मुक्त
----------------------------
भागीदारी
निःसर्ग अक्सर डाँटा करता है
उछलती बहती नदी को
"क्यों लुटा रही हो अपनी मिठास उस खारे सागर पर
वो कभी मीठा ना हो पाएगा"
नदी हर बार हँसकर कहती है
"ताकि वो
खारा होते-होते
एक दिन हलाहल ना बन जाए.."
नदी जानती है ...
सागर की प्रकृति खारी है
पर नदी यह मानती है कि
सागर के पानी में
उसकी मीठी भागीदारी है ।
-----------------------------
No comments:
Post a Comment