निवास-,रायपुर, छत्तीसगढ़ ।
जिला-रायपुर ।
शीर्षक- ""जीवन-तरंग "" ।
विधा- छ्न्द-मुक्त, कविता ।
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☆☆|||=="जीवन-तरंग "==|||☆
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यूँं तो हमको सुकून भी मिलता रहे--
और गुलशन भी महकता रहे ।
हर गुल की गन्ध,
यदि मदहोश करता रहे ।
तो कोई,क्यों न बहकता रहे,
और झुमता-मस्ती में गाता रहे ।
फिर,अनायास ही आग उठेगी,
होगा हमारा भी,मन-बंसत ,
खिल उठेगा ,मन का इन्द्रधनुष ।
उठते रहेगा ,रंगों का जीवन-तरंग,
फिर,बज उठेगा,जीवन में सरगम ।
खुशियाँ होंगी ढेरों,
लुटाने दो,मुझको यारों,
मैं,बहका नहीं हूँ--
न ही कोई नशे में हूँ ।
ये पल तो सबमें आता है,
तो,कोई खुशी से झूम उठता है,
तो,किसी के खुशी में---
आँसू भी निकल आते हैं ।
पर,जो हरदम---
खुशियाँ,लुटाता--बाँटता है,
सुकून,उसका ,सरताज बन जाता है,
और वह,गुलशन की खुशबू का--
हमेशा के लिए,हमराज हो जाता है ।।
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व्याख्या:--उपरोक्त कविता के माध्यम से यह कहना चाहता हूँ कि मानव जीवन में भी ऐसे पल आते हैं और वह खुशियों से झूम उठता है और कभी कभी उसके खुशी में आँसू भी निकल पड़ते हैं ।यही जीवन-तरंग की तरंग सबमें होती है ।
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