जिला- रायगढ़ (छत्तीसगढ़)
विधा- उत्प्रेक्षा अलंकार
विषय- वनांचल में शिक्षा का महत्व
शीर्षक- "हरीतिमा को मेरा प्रणाम"
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हरियाली हरीतिमा को मेरा प्रणाम है,
सुख शांति आठों प्रहर आठो याम है ।
आधुनिकता से दूर बीहड़ में,
सुरभित वसुधा की सुरमयी शाम है ।।
एकत्व की भावना वहाॅं सहज है,
सरिता से सुगंधित वन मलयज है ।
माना कच्चे हैं मकान गाॅंव में,
राष्ट्रपुष्प पुष्पित हुआ पंक से पंकज है ।।
साधु संतों का वहाॅं बसेरा हुआ करता था,
अरुणोदय में अरुण सवेरा हुआ करता था ।
लहलहाते थे खेत खलिहान,
हरे-हरे खेत में हरा मुॅंडेरा हुआ करता था ।
वन की देवी वनदेवी वन ही आराध्य थी,
दुरस्त दुर्गम स्थल में जीवन जरा दुसाध्य थी ।
वनसंपदा से भरी हुई,
जमीं मानो सोना उगलती संसाध्य थी ।।
सूनी हैं गलियॉं जैसे कोई कोहराम है,
मखमली शैय्या नहीं यहॉं पर चैन व आराम है ।
शिक्षा को शिक्षा का पयाम है,
हरियाली हरीतिमा को मेरा प्रणाम है ।।
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मौलिक रचना-
*गुलशन खम्हारी "प्रद्युम्न"*
रायगढ़ (छत्तीसगढ़)
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