Wednesday, August 5, 2020

बलिया ,उत्तरप्रदेश से कवि अमलदार निहार जी की कविता- सहित जानकी आ बसे राम,हृदय नीहार

अमलदार नीहार
हिन्दी विभाग
श्री मुरली मनोहर टाउन स्नातकोत्तर महाविद्यालय, बलिया

सहित जानकी आ बसे राम, हृदय 'नीहार'

अगुण-सगुण, कुछ भी कहो, अन्तर रमे पुनीत।
राम रमे ना ईंट में या फिर कनक-किरीट।।1437।।

कण-कण व्यापक राम वह, अणु-विश्वात्म-स्वरूप।
जिसमें ब्राह्मी चेतना, लखे भाव का भूप।।1438।।

चन्द्र-दिवाकर, व्योम-भू, वही चाँदनी-धूप।
दीन-दुखी के प्राण में भावन सत्य-स्वरूप।।1439।।

चिदानन्दमय सत्य-शिव राम रूप अभिराम।
सृष्टि सकल कीर्तन करे, रमे  सृष्टि में राम।।1440।।

अणोरणीयानः महत्  महीयान् है राम।
प्रणव-गूँज-अनुगूँज रव दिशा-काल-आयाम।।1441।।

उद-बुदबुद-रै जो मिला जीवन-रय संसार।
है असार, आवागमन अनगिन रूपाकार।।1442।।

कलरव करते सृष्टि-तरु दो पंछी इक डाल।
एक ब्रह्म द्रष्टा सुभग, एक जीव बदहाल।।1443।।

एक लखे अविकार फल, केवल लीला भाव।
एक भखे आसक्त मन, माया का प्रस्ताव।।1444।।

जीव-ब्रह्म के बीच में माया का विस्तार।
अनगिन लूत-वितान है, सघन भीति-कान्तार।।1445।।

डँसे भुजंगिनि बिबिरसन माया, मोह कराल।
जिसकी थामे बाँह प्रभु, उसे न जकडे़ जाल।।1446।।

मर्कट-शिशु, मार्जार-शिशु, जो भी भाव-स्वभाव।
राम सभी के, राम के रंक व राजा-राव।।1447।।

तत्त्व-ज्ञान से देख लो पाकर दृष्टि अभेद।
धर्म-पंथ की नाव में एक नहीं सौ छेद।।1448।।

लड़ते-मरते लोग जो--खल-प्रेरित नादान।
उनके स्वार्थ विशिष्ट, खुद बन बैठे भगवान।।1449।।

जिसमें निश्छल प्यार हो, बाँटे सबको प्यार।
सहित जानकी आ बसे राम, हृदय 'नीहार'।।1450।।

रचनाकाल  : 28 जुलाई, 2020
बलिया, उतातर प्रदेश

शब्दार्थ :

कनक-किरीट=स्वर्ण-मुकुट

अभिराम=सुन्दर

अणोरणीयान्=जो सूक्ष्म से भी सूक्ष्म है।

उद-बुदबुद=पानी का बुलबुला

रै=वैभव, धन-दौलत

रय=गति या प्रवाह

लूत-वितान=मकडी का जाला, लाक्षणिक अर्थ विषय-वासनाओं का जाल

भीति-कान्तार=भय का जंगल

बिबिरसन=दो जिह्वा वाली

मर्कट-शिशु=बन्दर का बच्चा, जो स्वयं अपनी माँ से चिपका रहता है और माँ भी उसे चिपकाये लिए कूदती-फाँदती है, अभिप्राय यह कि ऐसा भक्त, जो भजन-संकीर्तन, स्मरण आदि के माध्यम से एक जिद के साथ सप्रयास भक्तिभाव में लीन रहता है, जैसे भक्त ध्रुव।

मार्जार-शिशु=बिल्ले का बच्चा, जिसे कमजोर शिशु के रूप में उसकी माँ अपने मुँह में कोमलता के दाब के साथ इधर-उधर ले जाती है और दूध पिलाती है। अर्थात् प्रपत्ति भाव अथवा पूर्ण समर्पण कि प्रभु की जैसी इच्छा--जड़ भरत जैसी स्थिति।

महतो महीयान्=जो महन या विराट से अधिक महान है।

[नीहार-दोहा-महासागर : द्वितीय अर्णव(द्वितीय हिल्लोल) अमलदार नीहार]

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