जिला :- महासमुंद
विषय :- अधूरी ख्वाहिशें
विधा :- छंद मुक्त कविता।
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अधूरी ख्वाहिशें।
सावन के मास जैसी,
होती यादों की बारिशें।
कुछ पूरे हुए सपने,
कुछ अधूरी ख्वाहिशें।
अरमानों के अंबार में,
सपनों का संसार बसाया।
अधूरी ख्वाहिशों का कारण,
मैंने खुद से ना वादा निभाया।
सोचता रहा मन ही मन,
आखिर किसकी है रंजिश।
क्यों आखिर हो गई?
अधूरी मेरी ख्वाहिश।
ख्वाहिशों का अधूरा होना,
शायद मन में भटकाव का परिणाम है।
मेरे इस चंचल मन में,
ना ठहराव का कहीं नाम है।
संजोये सपने सुनहरे,
मुझे मंजिल तक जाना था।
भटक गया मैं राह में क्योंकि,
मन आवारा था, दीवाना था।
काश की दृढ़ संकल्प हो जाता,
मन मेरा अविचल हो जाता।
किस्मत मेरी भी मुस्काती,
अधूरी ख्वाहिशें अधूरी ना रह पाती।
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व्याख्या :- उपरोक्त पंक्तियों में रचनाकार ने अपने अधूरी ख्वाहिशों का वर्णन किया है, साथ ही यह भी बताया है कि क्या कारण है कि उसकी कुछ ख्वाहिशें अधूरी रह गई।
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