Tuesday, July 7, 2020

रायगढ़ से जगतसिंह ठाकुर 'बंजारीवाले' की रचना- गोठ खेती- किसानी के

रचनाकार--जगतसिंह ठाकुर 'बंजारीवाले'
स्थान--सारंगढ़ , जिला--रायगढ़ { छग }
विधा--कविता { छत्तीसगढ़ी भाखा म }
शीर्षक--'गोठ खेती-किसानी के'
                    ०×××××××०
बरसा  आगे  जग   हरियागे , बरसे  बादर   पानी ।
किसान   जतके  मेंछा   ऐंठें , करत हावैं किसानी ।।
काँटा  -  खूँटी   टारत   हावैं , कहूँ   लेके   जरावैं ,
नाँगर  -  जूड़ा - बैला   लेके , कोनो  जोतत  हावैं ।
राँपा  -  गैंती   धरके   कोनो , बाँधन लगें  मुहानी ।।
किसान   जतके  मेंछा   ऐंठें ,करत हावैं किसानी ।।१
कोनो   खुर्रा - बतरहा  घला , धान ल बोवत हावैं ,
आघू  के  हे   करयँ  तियारी , थरहा  घला लगावैं ।
धरके मुठिया  बड़  ततकारे , बढ़िया  लागै  बानी ।।
किसान   जतके  मेंछा   ऐंठें , करत हावैं किसानी ।।२
बाढ़े  म  हे   धान  के   संगी , करत  हावैं  निंदाई ,
खेत - खार  म  भरदरा  गेहे , रोपा   घला  जगाई ।
बहुत   भुथियार  लागे  हावैं , कहूँ    दूनो   परानी ।।
किसान   जतके  मेंछा   ऐंठें , करत हावैं किसानी ।।३
कहूँ  किसनहा  नाँगर  लेके , करत हावै  बियासी ,
झरझर-झरझर  बरसे  पानी , लागै बहुत कँपासी ।
राखड़ - दवाई   घला  छींचैं , रहे   बड़   परेसानी ।।
किसान   जतके  मेंछा   ऐंठें , करत हावैं किसानी ।।४
धान  के   पाके  म  हे  संगी , बूता  ह  गझा जाथे ,
भुथियार खोजे म  हे जतके , लहू  घला चुचवाथे ।
मिसाई  करे  खातिर  बर हे , करथें    आनाकानी ।।
किसान  जतके  मेंछा   ऐंठें , करत हावैं किसानी ।।५
पैरा     फेक   धान   धूँकाई , कठिन बुता हे भारी ,
आज आगे  मसीन  जमाना , सुविधा  होगे  सारी ।
खेती  हे 'ठाकुर' जबड़ बुता , सरल नोहे किसानी ।।
किसान   जतके  मेंछा   ऐंठें , करत हावैं किसानी ।।६
                          ०××××××०
व्याख्या--आघू जमाना म खेती-किसानी के परेसानी
              अउ आजकाल के मसीन जुग के बात ल
               बरनन करे के परयास करे हवँ ।

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