Tuesday, June 9, 2020

छत्तीसगढ़ के कांकेर जिले से मीरा आर्ची चौहान द्वारा सृजनित आलेख- गढ़िया पहाड़

कवयित्री का नाम-मीरा आर्ची चौहान
जिला-कांकेर,छग
शीर्षक-कांकेर की शान *गढ़िया पहाड़*
विधा-आलेख

रामायण काल में दण्डकारण्य के घने जंगलों के नाम से उल्लेखित स्थल, प्राकृतिक सौंदर्य से परिपूर्ण  कांकेर जिले की शान *गढ़िया पहाड़* का इतिहास हजारों वर्ष पुराना है। छग के पर्यटन स्थल के रूप में विकसित हो रहे इस प्राकृतिक पहाड़ की ऊंचाई  660 फीट हैं,जो अपनी अद्भुत सौंदर्य को स्वयं कत्थई चट्टानों और सघन पेड़ों के बीच शहर के हृदय स्थल से बहती *दूध नदी*
में स्वयं निहारता प्रतीत होता है। 
कहा जाता है कि पहले कभी कण्डरा वंश के राजा धर्म देव यहां निवास करते थे। यहां हजारों वर्ष पुराना *शिव मंदिर* है व जाना माना सोन ई-रुप ई नामक एक तालाब है। किंवदंती है कि सोन ई -रुप ई नाम की  राजा धर्म देव की बेटियां थीं ,जो तालाब के किनारे ही खेला करती थी। तालाब में डूबकर उनकी मृत्यु हो गई ,तब से इसे सोन ई- रुप ई तालाब के नाम से जाना जाता है,इस तालाब की खासियत है कि यहां का पानी कभी सूखता नहीं है,सुबह चांदी की तरह रुपहला व शाम को सोने की तरह सुनहरा यहां का पानी चमकता दिखाई देता है। लोगों की धारणा है सोन ई-रुपई की आत्मायें आज भी तालाब की रक्षा करती हैं, अतः पानी गर्मी में भी नहीं सूखता। यहां प्राकृतिक दृश्यों के सुंदर नजारे हैं। यहां मूर्ति यों का अंबार है। 
*कांकेश्वरी देवी* का मंदिर भी हैं, जहां नवरात्र के अवसर पर दीप प्रज्जवलित किया जाता है। मंदिर के पीछे एक गुफा है , जिसका रास्ता संकरा है। बहुत से ऋषि -मुनि यहां तपस्या करने आते थे।राजा यहां अपने सेना के साथ गुफा में आराम करने आते थे ।
यहां बहुत से एतिहासिक महत्व के स्थल हैं। पहले यहां चढ़ने के लिए सीढ़ियां बनाई गई थी, सीढ़ी के आगे  *सिंह द्वार* हैं। फांसी भाटा के नाम से उल्लेखित *डेथ पांईंट* भी है ,जहां से कैदियों को राजाओं के शासनकाल में ढकेला जाता था।
महाशिवरात्रि पर्व पर यहां मेला लगता है, सुबह से ही श्रद्धालुओं की भीड़ लगी रहती है। प्राचीन शिवलिंग के दर्शन के लिए विदेशी शैलानी भी आते हैं। हजारों की संख्या में भीड़ उमड़ती है।
इसे अब पर्यटन स्थल के रूप में विकसित किया जा रहा है। यहां जाने के लिए दो रास्ते हैं ।राजा पारा से सीढ़ियां हैं व नये बस स्टैंड के सामने से पहाड़ को काट कर पक्की सड़क बनाया गया है, जहां से बाईक व कार से भी ऊपर जा सकते हैं।जाते वक्त थोड़ी दूर जाने पर ईमली मोड़ दिखाई देगा, जहां *जोगी गुफा* है, कहा जाता है जोगी नाम के ऋषि ने यहां तपस्या की थी, इसलिए इसे जोगी गुफा कहा जाता है। उनके खड़ाऊ यहां आज भी है।
आगे प्राकृतिक सौंदर्य को अपने में समेटे यह पहाड़ अपने सौन्दर्य बिखेरता लोगों को अपनी ओर आकर्षित करता बहुत सुंदर दिखाई देता, चट्टानों के बीच घने पेड़ हैं, प्रकृति लुका-छिपी का खेल खेलती दिखाई पड़ती है। यहां बंदर भी बहुत हैं। अजगर और सांप की बहुत- सी प्रजातियां देखी गई हैं।
 नवरात्रि के अवसर पर  पहाड़ के नीचे मंडईभाटा में *गढ़िया महोत्सव* का भी आयोजन होता है। युवाओं के लिए कबड्डी प्रतियोगिता व प्रतिदिन विविध आयोजन यथा जगराता, सांस्कृतिक कार्यक्रम, अंतरराष्ट्रीय कवि गोष्ठी, बच्चों कार्यक्रम व भागवत कथा का आयोजन होता है, जिसका मुख्यमंत्री जी द्वारा उदघाटन होता है।
रात्रि को गढ़िया पहाड़ से  देखने पर शहर के नजारे नयनाभिराम 
दिखाई देते हैं। पूरा शहर बिजली के लट्टुओं से जगमगाता, चांदनी से नहाया हुआ दिखाई देता है। ऐसा प्रतीत होता है चांद सितारे जमीं पर उतर आए हैं।
इस प्राकृतिक *गढ़िया पहाड़* को पर्यटन स्थल के रूप विकसित किया जा रहा है।

*मीरा आर्ची चौहान*
*कांकेर, छग*

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