जिला-रायगढ़ (छत्तीसगढ़)
विषय-विश्व शांति
शीर्षक- "इंसान"
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सब जीवों में है जीव एक, कैसे-कैसे इंसान अनेक
इंसान इंसान न रहा, जरा सोच कर करो विवेक ।
कैसे अपना राज्य विस्तार में लगा,
बस शेष रह गया इस राज्य का राज्याभिषेक ।।
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इस धरती में जन्म लिया, इस मिट्टी की शान रहे
मानव योनि में अवतरित,मानव में मानव का मान रहे ।
मानवता बिन बस ढेला माटी का,
फिर अस्थि राख से सजी हुई श्मशान रहे ।।
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जीवन है अनमोल,जीव जगत का आधार
जीव से ही सब जिंदा है, शेष मुर्दा बेकार ।
जैसा चश्मा वैसा दिखेगा दुनिया,
जो आंखें मूंद लो फिर यह अंधा अंधियार ।।
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इंसान दुनिया का नियंता इंसान से इंसान उपजता,
सर्व गुणों का ज्ञान धरा फिर क्यों दिखे अज्ञानता ।
दूसरों का दमन करना बंद करो,
शर्म हया सब त्याग कर शेष रह गया निर्लज्जता ।।
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सत्कर्म सद्भाव से,हमें जीना होगा
दुख दर्द को सहज ही यहां पीना होगा ।
कुछ नहीं होगा वक्त को बुरा कहने से,
अपने हिस्से का दिया हमें खुद ही जलाना होगा ।।
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मर्यादा रहे मान रहे और इंसान में इंसान रहे
सत्कर्म में कर्म हो तो उसी कर्म में भगवान रहे ।
सहेज कर रखो खुद को खुद में,
जमीर जिंदा हो तो जिंदा स्वाभिमान रहे ।।
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गुलशन खम्हारी"प्रद्युम्न"
रायगढ़ (छत्तीसगढ़)
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