जिला- रायगढ़
विधा -वर्ण पिरामिड
शीर्षक- "मेरी कामना"
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मेरी कामना
हे
प्रभु
प्रकृति
आचरण
निश्चित तेरा,
करूँ वंदन मैं
उपकार हो मेरा।
मैं
सदा
संतुष्टि
हो जी पाऊंँ,
अपराध से
नित दूर रहूंँ ।
क्या मैं तुझसे कहूंँ।
मैं
क्षमा
प्रार्थना
चाहती हूंँ,
मैं उपकारी
बन जगत में,
मैं तुझे चाहती हूंँ।
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व्याख्या- इस कविता में कवित्री क्या बन कर जीना चाहती है और क्या पाना चाहती है इसी संदर्भ में यह कविता वर्ण पिरामिड लिखी गई है। कवित्री अपने मन की भावनाओं से करती है जी हे प्रभु तेरी प्रकृति निश्चित आचरण में है। मैं तुम्हारा रोज बंदना करती हू।
ताकि मेरा उपकार हो।
मैं हमेशा यह संसार में संतुष्टि अर्थात सुखी होकर जी पाऊं और अपराध से दूर रहकर सद मार्ग में जी पाऊं। मैं तुझसे क्या कहूंँ प्रभु? अर्थात तुझसे क्या मांँगू ?मैं तुझसे क्षमा चाहती हूँ। मैं इस संसार में उपकारी बनकर तुझे पाना चाहते हूँ।
प्रभु हमारे अंतरात्मा में ज्ञान स्वरूप में विद्यमान है कवित्री का भाव यही है कि प्रभु को ज्ञान स्वरूप में अपनी अंतरात्मा में पाना चाहती है और प्रभु से क्या मांगेगी, ज्ञान ही इस अस्तित्व में श्रेष्ठ है इसी श्रेष्ठता को पाना चाहती है और इस जीवन में उपकारी बनकर ज्ञान को प्रमाणित करना चाहती है ।प्रभु से यही कामना करती है।
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