जिला-कांकेर,छग
शीर्षक- *शिकायतों का शहर*
विधा-मुक्त छंद
जरा सोचिए अगर ,
आपने किसी को
कुछ कहा और
किसी ने उसे बता दिया
तो?जरा संभल कर
कहिए ,शिकायतों का
शहर है जनाब , शब्दों
को तोलिए।
शक्ल के मासुमियत पर
मत जाइए , परखिए
चेहरा नकाबपोश तो नहीं।
सच्चाई बहुत कड़वी
होती है जनाब,जरा
आहिस्ता बोलिए *दीवारों*
*के भी कान होते हैं*।
बहुत मिलेंगे हौसले को
ढहाने वाले जमाने में,
*अंगद के पांव* नहीं
डिगे किसी फसाने में
आपका हूनर किसी से
कमतर तो नहीं।
उठो और *ईंट से ईंट*
*बजा* कर दम लो,
लोहे के चने चबवा दो
तब सांस लो,रुक न
पाये पग तुम्हारा
एक जमीं दूज आसमां
पर हो।।
मीरा आर्ची चौहान
कांकेर, छग
बेहतरीन रचना
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